सायरन के बीच नहीं सुनाई देती क्षेत्र वासियों की जायज मांग,खोखले साबित हो रहे विकास के दावे
अनूपपुर। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 होकर मध्यप्रदेश सरकार के राज्य मंत्री दिलीप जायसवाल के गृह नगर बिजुरी तक जाने वाली सड़क के पहले से बेलिया मोड़ की टूटी व खाई नुमा गड्ढे वाली सड़क आज “विकास” के दावों पर सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। सालों से टूटी पड़ी इस सड़क पर गड्ढे इतने गहरे हैं कि गाड़ियों के पहिए उनमें समा जाते हैं। हर दिन कोई न कोई राहगीर चोटिल होता है। कई मोटर साइकिल सवार दुर्घटनाओं का शिकार होकर अपंगता झेल रहे हैं, किसी का हाथ टूटा, किसी का पैर, तो किसी का सिर फूटा। क्या यही है वह विकास, जिसकी दुहाई देकर मंचों से तालियां बटोरी जाती हैं?
राजनीतिक संरक्षण या प्रशासनिक उदासीनता?
यह सड़क कोई दूरस्थ गांव की पगडंडी नहीं, बल्कि मंत्री के गृह क्षेत्र को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है जब मंत्री जी के क्षेत्र में सड़क का यह हाल है,तो बाकी क्षेत्रों की स्थिति कैसी होगी? क्या विकास सिर्फ भाषणों और पोस्टरों तक सीमित है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से शिकायतें की गईं, ज्ञापन सौंपे गए, लेकिन परिणाम शून्य। लगता है क्षेत्रवासियों की आवाज मंत्री जी के काफिले में बजते सायरनों के शोर में दबकर रह गई।
चुनावी गणित बनाम जनहित
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो यह क्षेत्र मंत्री जी का प्रभाव क्षेत्र ही नहीं बल्कि उनकी विधानसभा है। यहां से उन्हें लगातार समर्थन मिलता रहा है। लेकिन क्या यही भरोसा अब लापरवाही की वजह बन गया है? क्या यह मान लिया गया है कि “अपना क्षेत्र है, वोट तो मिल ही जाएगा”? जनता के बीच चर्चा है कि सड़क निर्माण और मरम्मत के नाम पर बजट स्वीकृत होने के बावजूद ज़मीन पर काम क्यों नहीं दिखता? आखिर जिम्मेदार कौन है, लोक निर्माण विभाग, या राजनीतिक संरक्षण? दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। स्कूली बच्चे, दफ्तर जाने वाले कर्मचारी, किसान सभी इस बदहाल सड़क के शिकार बन रहे हैं। बारिश में गड्ढे तालाब बन जाते हैं और रात में ये मौत का जाल बनकर सामने आते हैं।
आईने से डर क्यों? जब टूट रही जीवन रेखा
अगर यही विकास मॉडल है, तो फिर सवालों से परहेज़ क्यों? आखिर मंत्री जी अपने ही गृह क्षेत्र की इस बदहाली पर खुलकर जवाब क्यों नहीं देते? जनहित में यह मांग उठ रही है कि: सड़क का तत्काल तकनीकी सर्वे कराया जाए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो निर्माण कार्य की समय-सीमा सार्वजनिक की जाए और हादसों की निष्पक्ष जांच हो क्योंकि सड़क सिर्फ डामर और पत्थर की नहीं होती यह जनता की जीवन रेखा होती है। और जब जीवन रेखा ही टूट जाए, तो विकास का दावा खोखला ही लगता है।