■ रहस्यमय तरीके से गायब हो रहे सिक्के
■ प्रशासनिक स्तर से नहीं हो रही कोई कार्रवाई
इन दिनों बाजार में एक नया चलन देखने को मिला है। बाजार में अधिकतर समय दुकानदार या खरीददार सिक्के लेने से मना कर देते हैं। पूछने पर उनका कहना होता है यह सिक्के अब नहीं चलते। जबकि जानकारों का कहना है कि अगर कोई सिक्के लेने से मना कर देता है तो वह राजद्रोह की श्रेणी में आता है। भारत के संविधान में लिखी राजद्रोह की धाराएं ऐसे व्यक्तियों पर लागू होती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सिक्के न लेकर मुद्रा को नुकसान पहुंचाया जाता है।
सूत्र बताते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में सुधार तभी होता है जब देश की मुद्रा चलायमान हो। यदि मुद्रा एक जगह जमा होगी तो इसका असर अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। जब तक कोई मुद्रा बंद न हो जाए, तब तक उसे लेने से इनकार नहीं किया सकता। भारतीय मुद्रा को फाड़ना, जलाना या लेने से इनकार करना मुद्रा के अपमान की श्रेणी में आता है। ऐसा करने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दंडात्मक कार्यवाही का प्रावधान है।
इमामुद्दीन सिद्दीकी/ सतना। भारतीय मुद्रा देश की संप्रभुता का प्रतीक होती है, इसलिए इसका अनादर करना एक दंडनीय अपराध है। राष्ट्रीय मुद्रा के अपमान से आशय है कि भारतीय मुद्रा यानि नोटों और सिक्कों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ करना, इसे जानबूझकर नुकसान पहुंचाना, या कानूनन वैध मुद्रा को लेने से इनकार करना। बावजूद इसके यह अपराध यहां खुलेआम हो रहा है। देश की राजधानी दिल्ली और प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक और दो रुपए के सिक्के धड़ल्ले से चलते हैं, लेकिन इन्हीं छोटे सिक्कों का प्रचलन यहां रहस्यमय तरीके से बंद हो गया है। अब तो नौबत यह है कि पांच का सिक्का भी चलन से गायब होता जा रहा है। लेन-देन व्यवहार में एक और दो रुपए के सिक्के क्यों स्वीकार नहीं किए जा रहे यह न केवल जांच का विषय है बल्कि इस पर कानूनी कार्रवाई किए जाने की भी सख्त जरूरत है।
भिखारी भी नहीं ले रहे ये सिक्के
बाजार में छोटी बड़ी कैसी भी खरीदी की जाए, वस्तु की कीमत में एक-दो रुपए का मानों कोई अस्तित्व ही नहीं बचा है। और तो और, भिखारी भी एक-दो के सिक्के लेने से साफ मना कर देते हैं। सूत्रों की मानें तो ऐसा इस शहर में ही है, प्रदेश में जबलपुर भोपाल सहित अन्य स्थानों पर इन सिक्कों को लेन-देन व्यवहार में बगैर न नुकुर स्वीकार किया जा रहा है। यहां तो एक,दो और पांच रुपए की जगह वैकल्पिक व्यवस्था अपनाई जा रही है। नौ रुपए की वस्तु के पूरे दस रुपए लेकर एक रुपए की अतिरिक्त बचत की जा रही है या लौटाए जाने वाले एक रुपए के एवज में टाफी अथवा कुछ और थमाया जा रहा है। किराना दुकान में टाफी दे देते हैं,तो सब्जी वाले धनिया मिर्च कुछ पकड़ा देते हैं या खुल्ले की समस्या से निपटने तौल में वजन बढ़ा देते हैं। ग्राहक न भी लेना चाहे,पर उसे जरूरत से ज्यादा वस्तु लेनी पड़ती है। सवाल यह है कि एक और दो के सिक्के गए कहां, इनके प्रचलन पर आखिर किसने रोक लगाई है। अगर किसी ने रोक नहीं लगाई है तो जिला प्रशासन इस विषय को गंभीरता से लेकर कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है। यदि प्रशासन ने अभी कुछ नहीं किया तो बहुत हद मुमकिन है कि एक और दो की तरह पांच के सिक्के का प्रचलन भी अघोषित तौर से बंद हो जाए।
नियमन की जा सकती है शिकायत
जानकार बताते हैं कि किसी भी वैध नोट या सिक्के जैसे 1, 2, 5, 10 या 50 के सिक्के को लेने से मना करना मुद्रा के अपमान के दायरे में आता है क्योंकि ये भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक के वादे के प्रतीक होते हैं।यदि कोई दुकानदार या व्यक्ति वैध भारतीय सिक्कों को लेने से इनकार करता है, तो इसे सरकार के आदेश की अवहेलना माना जाता है। ऐसे मामलों में आरबीआई हेल्पलाइन, स्थानीय प्रशासन, पुलिस से शिकायत की जा सकती है।