522 ईसा पूर्व से जुड़ा बताया जाता है मंदिर का इतिहास, सुबह कपाट खुलने पर पहले से पूजा होने की जनश्रुति; अनपढ़े शिलालेख आज भी बने हैं रहस्य
मैहर। मध्य प्रदेश के मैहर स्थित मां शारदा शक्तिपीठ की पहचान धार्मिक आस्था और प्राचीन इतिहास के अनूठे संगम के रूप में है। विंध्य पर्वत श्रेणियों के बीच त्रिकूट पर्वत पर विराजमान मां शारदा के इस मंदिर को लेकर अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे चर्चित मान्यता देवी भक्त आल्हा से जुड़ी है। जनश्रुति है कि मंदिर के कपाट रात में बंद होने के बाद भी आल्हा मां की पूजा करने आते हैं और सुबह मंदिर खुलने पर पूजा संपन्न मिली होती है। इस रहस्य को लेकर श्रद्धालुओं में आज भी गहरी आस्था बनी हुई है।
कपाट बंद होने के बाद भी पूजा की आवाज सुनाई देने की मान्यता
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, शाम की आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और पुजारी पहाड़ से नीचे उतर आते हैं। इसके बावजूद मंदिर के भीतर से घंटियों और पूजा-अर्चना की आवाज सुनाई देने की बातें कही जाती हैं। मान्यता है कि मां शारदा के अनन्य भक्त आल्हा आज भी उनकी आराधना करने आते हैं और ब्रह्म मुहूर्त में होने वाले पहले श्रृंगार से भी उनका संबंध माना जाता है। मंदिर के पूर्व प्रधान पुजारी महंत श्री श्री 108 पंडित देवी प्रसादजी महाराज के अनुसार, सुबह जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, तब पूजा पहले से हुई मिलती है। इस रहस्य की पड़ताल के लिए वैज्ञानिकों की टीम भी यहां पहुंच चुकी है, लेकिन श्रद्धालुओं के बीच यह मान्यता अब भी कायम है।
522 ईसा पूर्व से जुड़ी है मंदिर की प्राचीनता
त्रिकूट पर्वत पर स्थित मां शारदा मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन बताया जाता है। प्रचलित विवरणों के अनुसार, मंदिर का संबंध 522 ईसा पूर्व से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि इसी वर्ष चतुर्दशी के दिन नृपल देव ने यहां सामवेदी की स्थापना की थी। इसके बाद त्रिकूट पर्वत पर पूजा-अर्चना की परंपरा आरंभ होने की मान्यता है। विंध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य स्थित इस शक्तिपीठ के बारे में यह भी मान्यता है कि मां शारदा की प्रथम पूजा आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी। मैहर पर्वत का उल्लेख प्राचीन धार्मिक ग्रंथ ‘महेन्द्र’ और पुराणों में अन्य पर्वतों के साथ होने की बात भी कही जाती है।
अनपढ़े शिलालेखों में छिपे हैं इतिहास के संकेत
मां शारदा मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि इतिहासकारों की रुचि का विषय भी रहा है। प्रसिद्ध इतिहासविद् ए. कनिंघम ने मंदिर और उससे जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्यों का अध्ययन किया था। मैहर स्थित जन सूचना केंद्र के पंडित मोहनलाल द्विवेदी के अनुसार, मंदिर से संबंधित ऐसे शिलालेख भी हैं, जिनकी लिपि अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
बताया जाता है कि इन शिलालेखों की लिपि नौवीं और दसवीं शताब्दी की मानी जाती है। इन्हें पढ़ने में सफलता नहीं मिलने के कारण इनसे जुड़े कई सवाल अनसुलझे हैं। मां शारदा की प्रतिमा के ठीक नीचे मौजूद शिलालेख भी इतिहास की अनेक पहेलियों को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
आल्हा-ऊदल की वीरगाथा से भी जुड़ा है क्षेत्र
मंदिर के पीछे आल्हा और ऊदल से संबंधित अखाड़े स्थित हैं। दोनों को इतिहास की प्रसिद्ध वीरगाथाओं और देवी भक्ति की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। परिसर के समीप एक तालाब और भव्य मंदिर भी है। यहां आल्हा की विशाल प्रतिमा स्थापित है, जिसके हाथ में उनकी तलवार दर्शाई गई है। स्थानीय मान्यता में आल्हा को अमरत्व का वरदान प्राप्त होने की कथा भी प्रचलित है।
आस्था और इतिहास का अनूठा संगम
मां शारदा शक्तिपीठ में देशभर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यहां की धार्मिक परंपराओं, आल्हा से जुड़ी जनश्रुतियों और प्राचीन शिलालेखों ने मंदिर को विशिष्ट पहचान दी है। वर्ष 1922 में जैन दर्शनार्थियों की प्रेरणा से तत्कालीन महाराजा ब्रजनाथ सिंह जूदेव ने मंदिर परिसर में जीव बलि पर प्रतिबंध लगा दिया था। मैहर का यह शक्तिपीठ आज भी धार्मिक विश्वास, वीरगाथाओं और ऐतिहासिक रहस्यों के कारण श्रद्धालुओं तथा इतिहास में रुचि रखने वालों को आकर्षित करता है। आल्हा द्वारा मां की पूजा किए जाने की मान्यता भले ही जनश्रुति का हिस्सा हो, लेकिन स्थानीय आस्था में इसका विशेष स्थान बना हुआ है।
