■ एफडी से जुड़ा है मामला
■ सीएसपी से हुई शिकायत
■ आंतरिक जांच के लिए आ सकते हैं बैंक के वरिष्ठ अधिकारी
सतना। सिटी कोतवाली क्षेत्र अंतर्गत शहर के राजेंद्र नगर में स्थित आईडीबीआई बैंक इन दिनों गड़बड़ घोटाले के आरोप से घिर कर सुर्खियां बटोर रहा है। बैंक पर लग रहे आरोपों के मुताबिक यह पूरा मामला ग्राहकों द्वारा बैंक में जमा कराई गई फिक्स्ड डिपॉजिट रकम के खाते बैंक के सिस्टम से गायब हो जाने तथा जमा रकम खाते से निकाल लिए जाने से जुड़ा बताया जा रहा है। इसमें बैंक से खाताधारक को फर्जी एफडी थमाने की बात भी चर्चा में है। आरोप बेहद गऔर मामला संगीन है,जिस पर बैंक के लोग फिलहाल कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं।
अलबत्ता सूत्रों की मानें तो गड़बड़ी की आशंका होने पर बैंक के अंदर गुपचुप तरीके से जांच चल रही है,और यह जिम्मेदारी एजीएम आशीष तिवारी को दी गई है, उन्हें यहां कपिल कुमार की जगह ब्रांच मैनेजर बनाकर भेजा गया है जबकि तत्कालीन ब्रांच मैनेजर कपिल कुमार को रीजनल आफिस में अटैच कर दिया गया है। सूत्र बताते हैं कि जो मामला उजागर हुआ है वो कपिल के कार्यकाल से जुड़ा है। माना जा रहा है कि इसीलिए कपिल को यहां से हटाकर जांच के मकसद से आशीष तिवारी को लाया गया है। बहरहाल, आशीष तिवारी अभी इस मामले में कोई बात करने को तैयार नहीं है, लेकिन यह अवश्य स्वीकार करते हैं कि शिकायत मिली हैं जिनपर जांच हो रही है। यहां बता दें कि इस मामले की शिकायत कलेक्टर और एसपी से भी हुई है। कलेक्टर ने एलडीएम यानि जिला अग्रणी बैंक प्रबंधक को जांच के लिए निर्देशित करते हुए तीन दिन में रिपोर्ट मांगी है। दूसरी ओर खबर यह भी है कि जांच के लिए आईडीबीआई बैंक के जीएम आज सतना आ सकते हैं। यहां बता दें कि इस कथित गड़बड़ घोटाले को लेकर मामले में अब पुलिस भी अपने तरीके से जांच शुरु कर सकती है। दरअसल, शुक्रवार 9 अक्टूबर को ममता चौधरी, लल्लू चौधरी, मोनू वर्मा एवं खुशीराम बागरी ने अपने साथ हुए घटनाक्रम से सीएसपी मनीष त्रिपाठी को अवगत कराते हुए प्रकरण से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज भी उपलब्ध कराए हैं जिन्हें देखने के बाद सीएसपी ने न्यायोचित कार्रवाई का भरोसा दिया है। पूरे मामले को लेकर फरियादियों का कहना है कि उन्हें इस बात की आशंका है कि बैंक के लोग बदनामी से बचने और किसी बड़े घोटाले को उजागर होने से रोकने के लिए बैंक की आंतरिक जांच का हवाला देकर किसी न किसी को बचाने की खिचड़ी पका रहे हैं, इसलिए इस प्रकरण की जांच पुलिस से कराने के लिए उन्होंने आवेदन दिया गया है।
[पुलिस करेगी जवाब तलब]
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि आईडीबीआई बैंक की सतना शाखा में खुलवाए गए फिक्स्ड डिपॉजिट खाते अचानक बैंक के मुख्य सिस्टम से ही गायब हो गए हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि ये वो पैसे थे, जो पीड़ित परिवारों को किसी एक्सीडेंट केस में क्षतिपूर्ति के रूप में मिले थे जिन्हें कोर्ट के आदेश के बाद बैंक में सुरक्षा के लिए निश्चित समय सीमा के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में जमा कराया गया था। जांच का विषय है कि निर्धारित समय से पहले एफडी अगर टूटी तो कैसे टूटी और उसका पैसा गया कहां। शिकायतकर्ता कहते हैं कि तय समय से पहले एफडी को तोड़ना सीधे तौर पर माननीय न्यायालय के आदेश की अवहेलना है, इस पूरे मामले की बारीक छानबीन होनी चाहिए। सूत्र बताते हैं कि पुलिस अब बैंक संबंधित प्राप्त शिकायतों को लेकर बैंक के अधिकारियों से जवाब एवं जरूरी दस्तावेज तलब करने के लिए उन्हें जल्द ही नोटिस जारी कर सकती है।
[यह है पूरा मामला]
उचेहरा तहसील के जिगनहट निवासी लल्लूलाल चौधरी के बेटे नीरज की रेल दुर्घटना में मौत हुई थी। मामले में रेल दावा अधिकरण के आदेश के बाद परिवार को कुल 11,88,340 रुपए का मुआवजा मिला था। इसमें लल्लूलाल और उनकी पत्नी ममता के हिस्से में 5,94,170-5,94,170 रुपए आए थे। कोर्ट के निर्देश के अनुसार, मुआवजे की राशि का एक हिस्सा बैंक में एफडी के रूप में जमा कराया गया। परिवार ने यह रकम आईडीबीआई बैंक की राजेंद्र नगर शाखा में जमा कराई थी। लल्लूलाल के अनुसार, बाद में जब वह एफडी से मिलने वाले ब्याज की जानकारी लेने बैंक पहुंचे तो उन्हें पहले बताया गया कि एफडी ही फर्जी है।इसके बाद उन्होंने पत्नी ममता की करीब 3.90 लाख रुपए की एफडी से जुड़े पुराने दस्तावेज बैंक को दिखाए। तब बैंक की ओर से बताया गया कि संबंधित खाता बंद हो चुका है।लगातार पूछताछ के बाद उन्हें यह जानकारी मिली कि एफडी की रकम कथित तौर पर निकाल ली गई है और संबंधित नंबर की एफडी अब बैंक रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है। इसके बाद से लल्लूलाल बैंक, पुलिस और जनसुनवाई में शिकायत लेकर चक्कर लगा रहे हैं। नागौद तहसील के महकोना गांव के खुशीराम बागरी के बेटे देव बागरी हादसे में गंभीर रूप से घायल हुए थे। दुर्घटना में उनका बायां पैर कट गया था। मामले में कोर्ट के आदेश के बाद करीब 10.17 लाख रुपए की राशि आईडीबीआई बैंक की राजेंद्र नगर शाखा में जमा कराई गई थी। इस एफडी की मैच्योरिटी 2033 में होनी थी और कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, निर्धारित अंतराल पर मिलने वाला ब्याज देव के संरक्षक पिता खुशीराम को दिया जाना था।खुशीराम का कहना है कि करीब एक साल तक उन्हें ब्याज की राशि नहीं मिली। बैंक पहुंचकर जानकारी लेने पर पता चला कि जिस मूल खाते पर 6.80 फीसदी ब्याज मिलना था वह बैंक के सिस्टम में मौजूद नहीं है। पूछताछ करने पर बैंक की ओर से कर्मचारियों की गड़बड़ी की बात कही गई और नया खाता खोलने का प्रस्ताव दिया गया।इसके बाद देव के नाम से नया खाता बनाया गया लेकिन उसमें ब्याज दर घटकर 5.95 फीसदी हो गई। खुशीराम ने इस पर आपत्ति जताई तो बाद में एफडी तोड़कर उनके नाम से दूसरी एफडी बनाए जाने की बात सामने आई। उनका आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में मूल एफडी और उसकी राशि का हिसाब स्पष्ट नहीं किया गया। नए खाते में भी करीब 60 से 70 हजार रुपए का अंतर बताया जा रहा है। उनका कहना है कि बैंक कर्मचारियों ने संबंधित दस्तावेज अपने पास रख लिए और मामले को लगातार टालते रहे।

